भावनाओं से संभावनाओं तक 2027 में उत्तर प्रदेश 

दिन-प्रति-दिन लोकतंत्र की चुनौतियां बढ़ती जा रही है। ‎2027 में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा तथा मणिपुर में विधानसभाओं के चुनाव होने हैं। विधानसभा चुनाव अपेक्षित है। ‎भारत में लोकतंत्र की स्थिति नाजुक है। लोकतांत्रिक राजनीति में शक्ति का स्रोत ‎राज्य के प्रशासनिक उपकरणों में न होकर जनता की सहानुभूति में होता है। राज्य ‎के प्रशासनिक उपकरणों की शक्तियों के इस्तेमाल का साहस भी जनता की ‎सहानुभूति से नहीं निकलता है। 

खोती हुई सहानुभूति और बढ़ती हुई खीझ

भारतीय जनता पार्टी के शासन में अब सरकार की ‎प्रशासनिक शक्तियों के इस्तेमाल के साहस का संबंध प्रशासनिक उपकरणों से ‎सीमित हो कर रह गया है! सब से गहरा सवाल कि आखिर आस्था की राजनीति करनेवालों ने किस प्रकार से ‎जनता की सहानुभूति खो दी है। जनता की सहानुभूति खोने के बाद सत्ताधारी दल की राजनीति खीझ से भरी हुई है।

इस खीझ के साथ ध्रुवीकरण की तरफ बढ़ने के लिए मजबूर है जबकि इसी ध्रुवीकरण की राजनीति के चलते ही सत्ताधारी दल के प्रति लोगों की सहानुभूति शिथिल होती चली गई, और अब अपने न्यूनतम स्तर  पर पहुंच गई है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 का ‎महत्व भारत की सत्ता संरचना के नजरिये से बहुत अर्थपूर्ण है। अब सत्ता के मचान के ‎नीचे जबरदस्त हलचल मची हुई है। जैसे मचान के नीचे जनाक्रोश का बाघ है और मचान पर निहत्था सत्ता के शिकारी! 

सत्ता के अंतःपुर में कल्याणकर कोहराम 

राम से कोहराम का सफर! भला कोहराम से कल्याण कैसे? क्या है कल्याणकर कोहराम? परेशान करनेवालों के बीच कलह का कोहराम परेशान, लोगों के लिए कल्याणकर ही होता है। क्या भाजपा-आरएसएस का एक अंदरूनी हिस्सा भी योगी आदित्य नाथ की स्थिति ‎में खोट पैदा करने में लगा हुआ है? जाहिर है कि इस का कोई सीधा-सरल जवाब ‎नहीं हो सकता है। समझने की खास जरूरत है कि जिन सवालों का सीधा-सरल ‎जवाब न हो, उन्हें गैर-जरूरी नहीं माना जा सकता है।‎

कांशीराम स्मृति उपवन में भाजपा को दोहरी राजनीति की गंध में कुछ-न-कुछ जरूर उपयोगी था। शुरू में इसे कारगिल युद्ध के शहीदों की स्मृति से जोड़ा गया था। मायावती सरकार ने इस में कांशीराम का नाम जोड़ दिया। कांशीराम दलित राजनीति की रणनीतिक जरूरत और महत्व को उभारनेवाले सब से बड़े नेता थे। कांशीराम बसपा के संस्थापक थे और जाहिर है कि उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति के सबसे प्रभावशाली चेहरा थे।  योगी आदित्य नाथ के शपथ ‎समारोह के लिए इस स्थान के चुनाव का उद्देश्य साफ-साफ समझा जा सकता है। 

बहन मायावती की बहुजन की राजनीति को थोड़ा पीछे करते हुए कांशीराम के सम्मान को आगे कर दलित वोट को सीधे साधने की कोशिश लंबे समय से कर रही थी। एक उद्देश्य ओबीसी के ठगे जाने से होनेवाली राजनीतिक क्षति को कम करना भी था। दूसरा उद्देश्य था ओबीसी की पराजित शक्ति को इस आश्वासन के साथ अपने हाथ में रखना कि ओबीसी के नेता के रूप में उनकी ताकत को चुनौती देनेवाले किसी व्यक्ति को फिलहाल भारतीय जनता पार्टी में उभरने नहीं दिया जायेगा।

यानी बहुजन समाज पार्टी की राजनीति को पीछे और ओबीसी की राजनीति का रणनीतिक साथ! बहन मायावती शपथग्रहण समारोह से दूर रही जबकि समाजवादी पार्टी सत्ता के साथ में संभावनाओं की गंध मिल रही थी! 

योगी आदित्य नाथ के अलावा भाजपा-आरएसएस के मुख्यमंत्री पद के जो भी प्रत्याशी थे वे अलग से राम मंदिर का राग अलापने में सक्षम नहीं थे, कारण कि किसी के पास हिन्दू युवा वाहिनी नहीं थी! ध्यान रहे, राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ‎का वह अंतिम फैसला आना ‎2017 में बाकी था जो नवंबर 2019 को आया था।

यही कारण था कि ओबीसी के नेता केशव प्रसाद मौर्य के नेतृत्व में भाजपा ने ‎2017 में भारी बहुमत से जीत हासिल की थी‎। वही मुख्यमंत्री के स्वाभाविक दावेदार थे, लेकिन ओबीसी नेता के नये रूप में केशव प्रसाद मौर्य के उभार से भाजपा की उच्च-वर्ण राजनीति को भीतर से चुनौती मिलनी शुरू हो गई थी। 

केशव प्रसाद मौर्य के उभार से ओबीसी के पारंपरिक नेताओं में भी बेचैनी कम नहीं थी। इसलिए कांशीराम स्मृति उपवन में ‎ योगी आदित्य नाथ के शपथ ‎समारोह में मंच पर मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव तो थे, लेकिन बहुजन समाज पार्टी ‘सुप्रीमो’ बहन मायावती नहीं थी। 

आइकन का सम्मान और असल को रामराम 

कांशीराम जैसे दलित आइकन का सम्मान करके भाजपा ने मायावती की बहुजन राजनीति का सूत्र अपने हाथ में लेने की लगभग सफल कोशिश की! 2017 में भाजपा ने भारी बहुमत से जीत हासिल की थी और ऊपरी जातियों के अलावा दलित-पिछड़े वर्गों तक अपनी पैठ बढ़ाने की कोशिश में सफल हुई थी। 

फिर कहें कि क्यों बहन मायावती ने उस शपथग्रहण समारोह का बहिष्कार किया था। भाजपा की भविष्यलक्षी राजनीति को मायावती ने भलीभांति भांप लिया था। मायावती ने समय पर वक्तव्य दिया और आरोप लगाया कि भाजपा विकास के बजाय ध्रुवीकरण की राजनीति करती है, कर रही है। मायावती की नाराजी से लापरवाह भाजपा ने जगह नहीं बदली। मायावती की राजनीतिक झुंझलाहट और मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव के शपथ सहयोग से भाजपा-आरएसएस को अपनी राजनीतिक दिशा सही लगी थी। 

जो अभी हकीकत में है 

इतिहास में ऐसे दर भी आते हैं जब गए कल का सपना आज की हकीकत बन जाता है और आज की हकीकत आनेवाले कल के लिए सपना बनकर रह जाता है। लेकिन जो अभी हकीकत में है! उत्तर प्रदेश विधानसभा में कुल सीट 403 है। स्पष्ट है ‎कि सामान्य बहुमत के लिए 202 विधायकों की ‎जरूरत होती  है। उत्तर प्रदेश की वर्तमान विधानसभा ‎में एनडीए की सम्मिलित संख्या 294 है और भाजपा ‎के पास खुद 258 विधायक हैं।

मतलब यह कि अकेले ‎दम भाजपा के पास सामान्य बहुमत के लिए यथेष्ट ‎संख्या है और एनडीए के साथ मिलकर पूर्ण बहुमत के ‎लिए यथेष्ट संख्या है। वर्तमान विधानसभा में ‎समाजवादी पार्टी की अकेले दम पर 101 विधायक ‎हैं। कांग्रेस के पास महज दो विधायक हैं। बहुजन ‎समाज पार्टी के पास भी एक ही विधायक हैं। कुल ‎मिलाकर यह कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 ‎में चुनावी लड़ाई आरएसएस-भाजपा और समाजवादी ‎पार्टी के बीच में है। ‎

मजबूत और मजबूर का सवाल 

पहली नजर में पिछले विधानसभा में तुलनात्मक रूप ‎से भाजपा की दलीय स्थिति अधिक मजबूत दिखती ‎है। हालांकि भाजपा की अपनी आंतरिक राजनीतिक ‎समझ के अनुसार 150 के आस-पास वर्तमान विधायकों की ‎जीत हवा में झूलती नजर आ रही है। इन 150 सीटों ‎पर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 का ‎दारोमदार है; इन्हीं पर सत्ता की छीनाझपटी। ‎

लगभग 2 लाख 41 हजार वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में करीब ‎24.35 करोड़‎ की ‎आबादी यानी भारत की आबादी के 17 प्रतिशत के साथ उत्तर प्रदेश आबादी के ‎लिहाज से भारत का सबसे विशाल इलाका है। घनत्व बहुत अधिक है और अधिकांश ‎लोग अभी भी ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं, हालांकि शहरीकरण धीरे-धीरे बढ़ रहा है। ‎

एकात्मवादी उत्तराधिकार, अतिरेक, उत्तेजना से रक्षा में हत्या  

भारत विविधताओं का देश है, जाहिर है कि उत्तर प्रदेश को भी उस की विविधताओं ‎में ही समझना संभव है। हमारी सोच की कई विसंगतियों में से शायद यह भी है कि ‎हम भारत की विविधताओं की बात करते हुए राज्यों के भीतर की विविधताओं को ‎नजर-अंदाज कर देते हैं। ‎भिन्नताओं में स्वाभाविक विरुद्धताएं होती है।

सांस्कृतिक प्रयासों और कालांतर से सह-अस्तित्व और सहकार विकसित होती हैं। इस तरह से विरुद्धताएं परस्पर अविरोधी बनती हैं और अंततः शांत बनी रहकर विविधताओं के रूप में राष्ट्र की संघीय एकता का आधार बनती हैं। 

सह-अस्तित्व और सहकार की स्थिति-परिस्थिति की भावनाओं के आहत होते ही विविधताएं भिन्नताओं में और फिर भिन्नताएं विरुद्धताओं में बदल जाती है। जाहिर है कि राष्ट्र की संघीय एकता और संघात्मक ढांचा का आधार खिसकने लगता है। ध्रुवीकरण की राजनीति के एकात्मवादी उत्तराधिकार, अतिरेक, उत्साह और अतिरेक ने सह-अस्तित्व और सहकार की भावनाओं को बुरी तरह से आहत किया और अखंड भारत की बात करते हुए रक्षा में हत्या का गुनाह करती रही है।  

आंकड़ा पर बात नहीं होती अकड़ पर चुनाव होता है 

अभी तो ‎2011 की जनगणना ‎के आधार पर पर ही बात की जा सकती है। उत्तर ‎प्रदेश में पुरुष-महिला अनुपात की बात करें तो 2011 की जनगणना में प्रति हजार ‎पुरुषों पर 912 महिलाएं थीं। 2026 के प्रक्षेपण के मुताबिक लगभग 12.66 करोड़ ‎पुरुष और लगभग 11.68 करोड़ महिलाएं हैं। साफ-साफ देखना-दिखलाना जरूरी ‎है कि महिलाओं का अनुपात पुरुषों की तुलना में कम दिखाई देता है। कुल मिलाकर ‎राज्य में पुरुष आबादी का आकार बड़ा है। 

यह सही है कि संख्या की हर बढ़त वर्चस्व ‎की स्थिति बनाये यह जरूरी नहीं है। उदाहरण के रूप में कहा जा सकता है कि ‎उच्च-वर्ग और सवर्णों की संख्यात्मक कमी से उन के सामाजिक वर्चस्व में कभी कोई ‎कमी नहीं देखी गई है। खासकर लोकतांत्रिक व्यवस्था में जहां वयस्क मताधिकार है, ‎जहां बंदों को तौला नहीं गिना जाता है, संख्यात्मक बढ़त के राजनीतिक वर्चस्व में ‎बदल जाने की आशंकाओं से इनकार नहीं किया जा सकता है। लेकिन अभी ये आशंकाएं ही हैं, हकीकत नहीं। 

लोकतंत्र का आभास और ईश्वर की प्रचुरता 

अहंकार और औद्धत्य लोकतंत्र के सब से बड़े दुश्मन और वर्चस्व मिजाजी के सब से प्रिय अलंकरण होते हैं। वर्तमान शासक-दल में न अहंकार की कोई कमी है और न औद्धत्य की ही कोई कमी है — विडंबना यह है कि जनता का छोटा किंतु संगठित हिस्सा अहंकार और औद्धत्य में अपने-अपने हिस्से के लोकतंत्र के ईश्वर को खोज लेती है — ईश्वर जरूरी है लोगों के लिए, एक हसीन खयाल के लिए, भरोसे के लिए, खासकर तब लोकतंत्र आभास अधिक हो! लेकिन इतना ईश्वर! भारत को ईश्वर की प्रचुरता ने परेशानहाल कर दिया है। 

वर्चस्व मिजाजी और लोकतंत्र! रंगून से टेलीफून! 

सवर्ण-‎वर्चस्ववाद संख्यात्मक बढ़त के चलते वर्चस्व बदल और पलट की आशंकाओं से बहुत बुरी तरह से पीड़ित है। भारत की लोकतांत्रिक राजनीति में वर्चस्व का सवाल ‎लगातार अर्थपूर्ण बना हुआ है। सवर्णों की वर्चस्व मिजाजी भारत के लोकतंत्र की कई अनसुलझी समस्याओं में से एक महत्वपूर्ण समस्या है।  

महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध अपराध की स्थिति तो भयावह है। महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध हुए अपराध से किसी की भी भावनाओं के आहत होने की बात यहां बहुत कम ही सुनाई देती है।

अपने-अपने अनुभवों के आधार पर लोगों का मानना है कि अपराध के घटने और घटना के रिकॉर्ड में दर्ज होने में तालमेल कम होता है, घालमेल ज्यादा होता है — इस तरह से थोड़ा-सा लोकतंत्र और थोड़ा-सा लोक-लिहाज!

वर्चस्व अपराध है, जितना वर्चस्व उतना अपराध 

सब से ज्यादा दागी जन-प्रतिनिधि वर्चस्व मिजाजी राज्यों से ही आते हैं। रोजगार के लिए प्रवासन प्रवृत्ति की ज्यादा खतरनाक स्थिति वर्चस्व मिजाजी हिंदी पट्टी में ही है। अभी परिसीमन हुआ नहीं है! लेकिन लोकसभा के 41% सांसद 543 में 225 ‘हिंदी-प्रदेश’ से आते हैं। इन में उत्तर प्रदेश का हिस्सा बड़ा की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। प्रधानमंत्री के पद तक पहुंचने का रास्ता! कहते हैं कि उत्तर प्रदेश से होकर जाता है! इस लोक धारणा, पब्लिक परसेप्शन है तो इस का कुछ-न-कुछ मतलब जरूर है।

यहां इस का व्यापक मतलब हिंदी पट्टी से भी होता है, ऐसा मानने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए। कहना न होगा कि सवर्णों की अनसुलझी वर्चस्व मिजाजी के निकृष्टतम असर से हिंदी पट्टी सब से ज्यादा ‎ त्रस्त है। हिंदी पट्टी के पवित्र घाट से कोई इस लोकतांत्रिक चेतावनी ध्वनि-प्रतिध्वनि करेगा कि लोकतंत्र शरणागतों का अरण्य नहीं अधिकार प्राप्त नागरिकों की ताकत है। रक्षा में हत्या की राजनीति को रोकना ही होगा — सुन रहे हो भाई! दूर कहीं से आती हुई धूमिल आवाज की परवाह नहीं, क्योंकि न तुम भाषा में भदेस हो न कायर हो तुम उत्तर प्रदेश हो!  

मुंह खोलो कुछ इस तरह से कि जैसे उत्तर प्रदेश हो

यह अनसुलझी वर्चस्व मिजाजी सीधे-सीधे संविधान के बराबरी के सिद्धांत से टकराती है। विडंबना यह है कि हिंदी पट्टी के सवर्णों की वर्चस्व मिजाजी का संसदीय नेतृत्व गैर-हिंदी भाषी तथा गैर-सवर्ण करते हैं। दोष हिंदी पट्टी के मतदाताओं के ऊपर जबकि  जिनका अपने प्रदेश से अब कोई कद्दावर नेता नहीं है।  

क्या पुरुष-महिला अनुपात में बिगड़े संतुलन का असर अपराध  के घटते-बढ़ते ग्राफ ‎पर भी पड़ता है? घटता-बढ़ता तमिलनाडु, केरलम आदि भारत के विकसित राज्यों में ‎पुरुष-महिला अनुपात और विकास का भरोसे के लायक विश्लेषण किया जा सकता ‎है? भारत के राज्यों के संदर्भों में  लिंगानुपात और अपराध का सीधा-सरल निष्कर्ष ‎कि अधिक-पुरुष, अधिक-अपराध नहीं निकाला जा सकता है। अपराध के होने और ‎दर्ज होने में ताल-मेल नहीं होना किसी भी निष्कर्ष को संदिग्ध बना देता है, कम-से-‎कम भरोसे के लायक तो नहीं छोड़ता है।

‎महिलाओं की सक्रिय उपस्थिति और सशक्त भागीदारी मनुष्य की बनाई सभी संरचनाओं की नैतिक भित्ति तैयार करती है। राजनीति में बढ़ते मर्दवाद और मर्दवादी रुझान से इनकार नहीं किया जा सकता है, हिंदी पट्टी बगलें न झांकें सामने देखने की कोशिश करे, भविष्यलक्षी बने! सिर्फ प्रधानमंत्री का रास्ता न बनाये लोकतंत्र की गुणवत्ता को भी नेतृत्व दे उत्तर प्रदेश! हर चीज अपनी जगह पर ही शोभती है, आंख में लगे तो काजल! कहीं और लगे तो कालिख! महंत मठ में ही शोभते हैं! 

ढाई लोगों का जनतंत्र और बाकी ठनठन ‎गोपाल ‎

‎18 से 30 वर्ष की उम्र की आबादी उत्तर प्रदेश की ताकत और चुनौती दोनों है। राज्य ‎की औसत आयु अपेक्षाकृत कम है। 2026 के उम्र-समूह अनुमानों के अनुसार 18-‎‎30 वर्ष का दायरा बहुत बड़ा है। यह युवा वर्ग शिक्षा, रोजगार, कौशल विकास और ‎शहरी प्रवास का मुख्य स्रोत है। पूर्वांचल और अवध के कई इलाकों से युवा बड़े ‎पैमाने पर दिल्ली-एनसीआर, मुंबई या अन्य राज्यों की ओर जाते हैं।

यही उम्र ‎राजनीतिक दृष्टि से भी निर्णायक ही है। पहली बार मतदान के हक के इस्तेमाल का अपना रोमांच होता है। पहली बार मतदान करनेवाले युवा ‎मतदाताओं की संख्या करोड़ों में है। गौतम बुद्ध नगर जैसे पश्चिमी जिले काफी आगे ‎हैं, जबकि पूर्वी और बुंदेलखंड के कई जिले काफी पीछे हैं। तो फिर! क्या है  पैटर्न?

विकास के अंतराल और मतदान का  पैटर्न  

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ‎जिलों और पूर्वांचल के जिलों के बीच विकास के अंतराल की अंतर्कथाओं का ‎मतदान पैटर्न पर क्या असर पड़ता है? नहीं पड़ता है तो इस का मतलब यह हो सकता ‎है कि प्रतिव्यक्ति आय और हैपीनेस इंडेक्स के संबंधों को फिर से परिभाषित करना ‎जरूरी है। ‎विधानसभा में राजनीतिक दलों की वर्तमान ताकत ‎को देखते हुए भाजपा की तुलनात्मक स्थिति पहली नजर में ठीक-‎ठाक ही लगती है। 

लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव ‎के नतीजों को नजर के सामने आते ही पहली नजर ‎का नजरिया बदल जाता है। लोकसभा चुनाव 2024 ‎को चुनाव नतीजों के आधार पर देखा जाए तो उत्तर प्रदेश का ‎विधानसभा चुनाव 2027 का चुनाव काफी दिलचस्प ‎और विपक्ष के लिए संभावनाओं से भरा हुआ लगता है। ‎कहना न होगा कि उत्तर प्रदेश में विपक्ष का मतलब ‎समाजवादी पार्टी के साथ कांग्रेस है। 

संभावनाओं से ‎लबालब अवसर विपक्ष के सामने दिखता है। संभावनाओं को ‎संभव करने के लिए कई यक्षप्रश्नों का सही-सही ‎जवाब देना होगा। यक्षप्रश्नों का सही-सही जवाब ‎नहीं दिया जा सका तो लबालब संभावनाओं के ‎किनारे मूर्छितावस्था में पाये जाएंगे, विपक्ष के बांकुड़े। सभी यक्षप्रश्नों ‎का सही-सही जवाब राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के ‎दबाव और गठबंधन की जरूरतों के बीच संतुलन और ‎समझ से निकलेगा! नहीं तो फिर नमस्ते सदा वत्सले ‎गाते रहिए! 

क्या हम वहां हैं जहां से सुनाई देती है अपनी आवाज

नागरिक जमात की मुसीबत यह है कि ‎आरएसएस-भाजपा ने भारत के लोकतंत्र को वहां ‎पहुंचा दिया है, जहां लोक-हित कांग्रेस सहित आज के ‎विपक्षी राजनीतिक दलों के राजनीतिक हित से नत्थी ‎हो गया है। ‎क्या इस में बुरा तो कुछ नहीं है! है! भाजपा-आरएसएस सकारात्मक होती तो भारत के लोकतंत्र के लिए बहुत अच्छा होता! भारत के लोगों ने बहुत समय के बाद 2014 में किसी अकेली पार्टी को बहुमत की सरकार बनाने की ताकत दी थी। सुनिए मन की बात, करते रहिए मन भर गुण-गान! लेकिन कुल हासिल सब गुड़, गोबर!  

काजल की शोभा आंख में, महंत की शोभा मठ में 

आज  योगी आदित्य नाथ भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्रियों में सब से ज्यादा आला और निराला हैं। उन्होंने कभी कायदे से न तो विधायक दल की परवाह की, न कभी मोदी-शाह के निर्देशों की परवाह की! सामाजिक न्याय के सवाल पर धर्म संरचना और सामाजिक संरचना में टकराव बढ़ रहा है। राजनीतिक उथल-पुथल, उठापटक में न्याय-अन्याय का विचार कहीं दूर छिटक जाता है।

धर्म और ईश्वर में सन्निहित न्याय का संवेदनशील आश्वासन उस की सार्वभौम स्वीकार्यता को विश्वसनीय आधार देता है। राज्य और राजनीति की न्यायिक फिसलन के समय धर्म का सहारा उस की भावनाओं को संभालता है। डॉ राममनोहर लोहिया ने रेखांकित किया था — धर्म दीर्घकालीन राजनीति है और राजनीति अल्पकालीन धर्म। धर्म और राजनीति का विवेकहीन मिश्रण दोनों को भ्रष्ट कर देता है। 

आज के दौर में राजनीतिक चिंतक डॉ राममनोहर लोहिया के इस कथन को बार-बार पढ़ा जाना चाहिए। न धर्म को नकारा जा सकता है और न राजनीति को! तो फिर! धर्म और राजनीति के विवेकहीन मिश्रण करने की बेलगाम भाजपाई ताकत पर लगाम डालना जरूरी है। 

धर्म और राजनीति का विवेकहीन मिश्रण! अब और नहीं!

अब बारह साल के शासन में भाजपाई भाजपा-आरएसएस का पोशाक चिथड़ गया है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 का राजनीतिक दीर्घकालीन महत्व काफी बढ़ गया है! इस महत्व के हर पहलू को ‎समझना होगा — 

‎भारत और हिंदुस्तान पर्यायवाची नहीं हैं। असल में हिंदुस्तान हिंदी प्रदेश को संदर्भित करता है। भारतीय का अर्थ हिंदू बनाने की हर कोशिश की धूर्तता का अपने-अपने मन में  बार-बार पर्दाफाश करते रहना होगा। राम मंदिर चंदा-चढ़ावा चोरी और हर तरह की भ्रष्टाचार ‎कथा-कथांतर के बाद यह बिल्कुल साफ-साफ ‎समझना होगा कि ‎भाजपा-आरएसएस का हिंदुओं की पार्टी होने का दावा मर गया है।

महत्वपूर्ण राजनीतिक चिंतक डॉ राममनोहर लोहिया को ध्यान में रखकर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में धर्म और राजनीति के विवेकहीन मिलावट को हर हाल में रोकना होगा। हिंदू-मुसलमान की ही नहीं भारतीयों की एकता की संवेदनशीलता के साथ ही हर तरह की वर्चस्व मिजाजी की शुरुआत की जानी चाहिए। 

भावनाओं का संतोष और संभावनाओं की तलाश 

भावनाओं से संभावनाओं तक 2027 में उत्तर ‎प्रदेश ‎महत्वपूर्ण है। लेकिन लाख टके का सवाल अभी भी यही है कि क्या चौराहे पर खड़े भारत के लोकतंत्र को सुदृढ़ कोणीय गति (Angular Momentum) देने के लिए बेधड़क चुनावी धक्का लगेगा! जवाब वक्त देगा।

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